हिंदी उन सभी गुणों से अलंकृत है जिनके बल पर वह विश्व की साहित्यिक भाषाओं की अगली श्रेणी में सभासीन हो सकती है। - मैथिलीशरण गुप्त।
लक्ष्य-भेद
बोलो बेटे अर्जुन!
सामने क्या देखते हो तुम?
संसद? सेक्रेटेरिएट? मंत्रालय? या मंच??
अर्जुन बोला तुरंत--
गुरुदेव! मुझे सिवा कुर्सी के कुछ भी नजर नहीं आता ।
पुलकित गुरु बोले द्रोण--
हे धनंजय! तुम मंत्री पद वरोगे
काम कुछ भी नहीं करोगे/ फिर भी
धन से घर भरोगे
केवल कुर्सी के लिए जिओगे ।
और कुर्सी के लिए ही मरोगे ।
-मनमोहन झा
[ लगभग जीवन, संपादक- लीलाधर जगूड़ी सूर्य प्रकाशन मन्दिर, बीकानेर ]
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